जप प्रेरणा - चित्त की निचली प्रकृति को ध्यानपूर्वक जप करने का उपदेश दें। - Preach to the Lower Nature of the Mind to Chant Attentively- 19 Jun 20 – Hindi Translation of Summary of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
चित्त की निचली प्रकृति को ध्यानपूर्वक जप करने का उपदेश दें।Preach to the Lower Nature of the Mind to Chant Attentively.

जप प्रेरणा – 19 Jun 20 – Hindi Translation Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हरे कृष्ण।
मन के दो भाग जिनकी हम कल बात कर रहे थे एक संघर्षरत साधक भाग है और एक कृष्ण प्रतिनिधि है, गुरु परम्परा का प्रतिनिधि भाग है।
आप देखेंगे कि मन के संघर्षरत साधक भाग सदैव सोचता है कि मैंने पर्याप्त किया है पवित्र नाम प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है। मुझे कोई आदान प्रदान नहीं मिल रहा है, ओह यह बहुत कठिन है। यह असंभव है। मैंने इसे देख लिया है। इस प्रकार की चीख मन के उस भाग से आती है। किन्तु कृष्ण का प्रतिनिधि भाग सदैव पवित्र नाम से प्राप्त असंख्य लाभों की सराहना करने में सक्षम होगा।
आप देखेंगे, पवित्र नाम से दी गई शक्ति के बिना आप अच्छे चरित्र को बनाए रखने में सक्षम नहीं होते, और शुद्ध जीवनशैली जो हम अब जी रहे हैं, नहीं जी पाते। पवित्र नाम का जप किए बिना हमने कभी भी इतना आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं किया होता दुनिया को सही दृष्टि से देखने की स्पष्टता नहीं प्राप्त कर पाते। बहुत से ज्ञानी और योगी हैं जो गंभीर तपस्या करने के बाद भी क्रोध, मिथ्या अभिमान के शिकार हो जाते हैं, वे वासना के शिकार हो जाते हैं, और वे संसार में डूब जाते हैं।
किन्तु पवित्र नाम का जप भक्त के लिए बहुत सहज, आसान और निश्चित मार्ग हैं वापिस भगवद्धाम की ओर जाने का। पवित्र नाम निचली प्रवत्ति के हृदय की सफाई से लेकर कृष्ण की उपस्थिति में एक व्यक्ति तक पहुँचाने तक सभी कार्य करता है। और बीच के भी सभी कार्य करता है जैसे कि कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति जनम-बन्ध-विनर्मुक्ता बन जाता है, वह भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है। फिर वे कहते हैं कि विमुक्ति प्राप्त होती है, जिसका अर्थ होता है, मामुपेश्यसी बन जाता है, वे कहते हैं, मुझे प्राप्त होता है। इस प्रकार, ये सभी बातें पवित्र नाम से होती हैं, भले ही किसी को तुरंत पवित्र नाम के प्रभावों का पता न हो।
इसलिए व्यक्ति को मन की निचली प्रकृति को उपदेश देना चाहिए। ये गीत देखोगे तो हरि हरि! विफले जनम गुनाइनु, वे मन की निचली प्रकृति को प्रस्तुत कर रहें हैं, जो कृष्ण के पवित्र नाम से आकर्षित होने में असमर्थ है।
गोलोकेर प्रेम-धन, हरि-नाम-संकीर्तन,
रति ना जनमिलो केने ताई
संसार-बिषानले, दिबा-नीशी हिया ज्वाले,
जुराइते न कोइनु उपाय
वे बता रहे हैं कि यह भौतिक आग, जंगल की आग के समान है, भौतिक दुनिया में आग लगने पर भी मैं आध्यात्मिक जीवन में गंभीर नहीं हूं। यद्यपि कृष्ण आध्यात्मिक दुनिया से भौतिक दुनिया में उनके पवित्र नाम के रूप में अवतरित हुए हैं, मुझे पवित्र नाम के लिए कोई आकर्षण नहीं है। मैं कितना अभागा हूँ!
तो इस प्रकार से, हमारे लिए संघर्षपूर्ण साधक भाग आध्यात्मिक जीवन को बहुत कठिन बना देता है। भौतिक अस्तित्व के दुखों के आवेग के बाद भी अभी भी उन दुखों से जुड़ा हुआ है। और कोई उनसे ऊपर नहीं उठना चाहता। किन्तु फिर वह गाना यहीं नहीं रोकते, वे कहते हैं:
ब्रजेन्द्र-नंदन जेई, सची-सुत होइलो सेई,
बालराम होइलो निताइ
दीन-हीन जत छिलो, हरि-नामें उद्धारिलो,
तार साक्षी जगाई मधाई
हा हा प्रभु नंद-सुत, वृषभानु-सुता-जुत,
कोरुना कराहो एई-बारो
नरोत्तम-दास कोय, ना थेलिहो रांगा पाये,
तो इस प्रकार से, मन का निचला भाग या उच्च स्वयं बहुत ही दृढ़ता से श्री श्री गौर निताई का आश्रय ले सकते हैं, जो पवित्र नाम प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार, गुरु परम्परा के इस प्रकार के उपदेशों के साथ तालमेल बिठाकर धीरे-धीरे मन की निम्न प्रकृति को शुद्ध किया जा सकता है और संशय को दूर किया जा सकता है और संदेह को दूर किया जा सकता है, अशुद्ध व्यस्तताओं के लिए निम्न झुकावों को दूर किया जाए। और पवित्र नाम का जप करने से व्यक्ति का मन ढृढ़ हो सकता है, और पवित्र नाम में बहुत दृढ़ विश्वास विकसित हो सकता है।
हरिनाम प्रभु की जय !!!
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