जप प्रेरणा - भौतिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक निर्भरता का अभ्यास कैसे करें - How to Practice Material Independence and Spiritual Dependence - 4 Jun 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
भौतिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक निर्भरता का अभ्यास कैसे करें
How to Practice Material Independence and Spiritual Dependence
जप प्रेरणा – 4 Jun 20 – Hindi Translation of Summary of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
- भौतिक दुनिया में, जिस सीमा तक हम अपने भौतिक कार्यक्रम को सरल रखते हैं जैसे साधारण कपड़े का उपयोग करना, एक बहुत ही साधारण जगह में रहना तो किसी व्यक्ति को भौतिक अधिग्रहण के लिए अधिक कठिन संघर्ष नहीं करना पड़ता है। कृष्ण की कृपा से प्रकृति की व्यवस्था से ये सभी वस्तुएं बहुत आसानी से किसी के लिए भी उपलब्ध हो जाती हैं।
- व्यक्ति को सुरक्षा के विषय में अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए कि भविष्य में क्या होगा, दुनिया इस तरह चल रही है, मेरा दिमाग ऐसे चल रहा है। इसके विषय में बहुत ज्यादा चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि समय के साथ स्थितियां बदल जाएंगी। किन्तु भौतिक रूप से हमें खुद को अधिक से अधिक स्वतंत्र बनाना चाहिए, जैसे कि थोड़ा उपवास करके हम यह विश्वास हासिल करते हैं कि वास्तव में हमें दिन में तीन बार खाने की आवश्यकता नहीं है और उसके बिना भी हम जीवित रह सकते।
- हम भौतिक रूप से स्वतंत्र हो सकते हैं, किन्तु आध्यात्मिक रूप से हमें निर्भर रहना होगा। आज चिडा दही महोत्सव है, जो इस सिद्धांत का प्रतीक है कि कैसे रघुनाथ दास नित्यानंद प्रभु के चरण कमलों में निर्भरता के साथ भगवान चैतन्य महाप्रभु से जुड़ने के लिए याचना करते हैं। आप रूप सनातन को देखेंगे, उन्होंने भी नित्यानंद प्रभू और हरिदास ठाकुर की शरण ली भगवान चैतन्य महाप्रभु से मिलने के लिए। तो आप इस लीला में देखेंगे कि नित्यानंद प्रभु पर निर्भरता, वैष्णवों के आशीर्वाद पर निर्भरता और भगवान कृष्ण पर निर्भरता। आप पाएंगे कि वैष्णव जीवन दया के आधार पर है, जिसके बिना किसी को भी किसी भी प्रकार की प्राप्ति की कोई आशा नहीं है, कोई भी उन्नति, कोई आश्रय या समर्पण, असंभव!
- पवित्र नाम हमारे ह्रदय में जो करता है वो कुछ यांत्रिक ध्वनि कंपन नहीं है, किन्तु यह वास्तव में साक्षाद भगवान् कृष्ण वहां उपस्थित हैं, जो भक्त पर दया कर रहें हैं, जो सेवा के लिए याचना कर रहा है, जो शरण के लिए याचना कर रहा है, जो समर्पण करने का प्रयास कर रहा है, जो अपने अनर्थों के साथ संघर्ष कर रहा है, जो कृष्ण के साथ फिर से जुड़ने और अपने सम्बन्ध को पुनर्जीवित करने के लिए उत्सुक है।
- इसलिए जब भगवान को हमारे संघर्ष को देखकर दया आती है तो भगवान तुरंत भक्त का ह्रदय साफ कर देते हैं।
- विनम्रता की भावना, समर्पण की भावना ही है, जो पवित्र नाम के जप को समय के साथ-साथ प्रभावी बनाती है।
- पवित्र नाम भगवान से भिन्न नहीं है, प्रसादम भगवान से भिन्न नहीं है, और भक्त भगवान की तदीय हैं, भगवान की सामग्री हैं। इस उचित जागरूकता और आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ एक भक्त शास्त्रों में दिए गए पवित्र नाम के सकारात्मक आध्यात्मिक प्रभावों से अति शीघ्र लाभ उठा सकेगा। अतः पवित्र नाम के जप से हमें भगवान पर अपनी निर्भरता बढ़ानी चाहिए, हमें स्वयं के दोषों को देखने का अवसर देना चाहिए और अपने हृदय से उन दोषों को दूर करने की तीव्र इच्छा विकसित करनी चाहिए, फिर कृष्ण इसे शीघ्र ही शुद्ध कर देंगे।
हरिनाम प्रभु की जय !!!
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