जप प्रेरणा - मन की बकवास की उपेक्षा करते हुए जप करें - Chant Ignoring the Mental Chatter of the Mind - 12 Jun 20 – Hindi Translation of Summary of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
मन की बकवास की उपेक्षा करते हुए जप करें
Chant Ignoring the Mental Chatter of the Mind
जप प्रेरणा – 12 Jun 20 – Hindi Translation Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हरे कृष्ण।
हम जप के लिए यांत्रिक दृष्टिकोण का आश्रय क्यों लेते हैं? क्योंकि मन कई अन्य चिंताओं और आशंकाओं से ग्रस्त हो जाता है।
आप मानसिक बकबक देखेंगे, जो हमारे आस-पास की दुनिया, हमारे चारों ओर के वातावरण में सब कुछ सही कर देने के हमारे प्रयास से आरम्भ होती है, यह एक अंत रहित घटना के समान है क्योंकि एक समस्या को सुलझाने के बाद भी दूसरी तीसरी चौथी पाँचवी समस्या आती रहती है। इस प्रकार, मन पुर्णतः विभिन्न चिंताओं से ग्रस्त हो जाता है और समाधान खोजता रहता है और पुरानी समस्याओं को सुलझाता है, और बुलबुले के समान नई समस्याओं को जन्म देता रहता है जो पानी के नीचे से पानी की सतह पर आते रहते हैं, जिससे, मन जप के समय विभिन्न विचारों और योजनाओं और विचारों और समाधानों से घिर जाता है। जिसके कारण मन पवित्र नाम से हट जाता है, और इन समस्याओं पर ध्यान देने लगता है, जो एक प्रपात के समान आते हैं, परेड में एक के बाद एक आने वाले सैनिकों के समान। इस प्रकार, यदि कोई इस प्रकार की मानसिक बकवास से बचने का इच्छुक है, तो व्यक्ति को सहनशीलता का गुण विकसित करना होगा।
व्यक्ति को न केवल सभी बाहरी उत्तेजनाओं को सहन करना होगा, जो उस मानसिक बकवास को उत्पन्न करती हैं, अपितु व्यक्ति यह देखेगा कि मन के भीतर भी इन्द्रिय संतुष्टि के लिए अनेकों प्रस्ताव हैं। भौतिक संतुष्टि और भौतिक निपटान के लिए बहुत सारे प्रस्ताव हैं। अतः, व्यक्ति को यह जानना होगा कि मन न केवल विचारों के प्रस्ताव में लिप्त है, यह नियंत्रणहीनता की परिस्थिति में चला जाता है और अंततः मन और इंद्रियों दोनों का भोग करता है। और ये देख कर कोई व्याकुल हो सकता है और अंततः तंग आकर निराश हो सकता है। किन्तु यदि कोई व्याकुल होता है या उदास और निराश हो जाता है तो कोई सकारात्मक सुधार नहीं आयेगा।
व्यक्ति को समझना चाहिए, एक मालगाड़ी के समान, यदि आप अचानक से ब्रेक लगाते हैं तो ये 30-40 फीट के बाद जा कर रूकती है, यह तुरंत नहीं रुकती है। इसी प्रकार, लाखों जीवनकालों से हम इस भौतिक दुनिया में भटक रहे हैं, विभिन्न विचारों को आत्मसात रहे हैं और आनंद की योजना बना रहे हैं। अचानक मन एक अच्छे बच्चे के समान शांत स्थिति में आने वाला नहीं है। एक शरारती बच्चा सिर्फ बैठकर मुंह बंद रखने वाला नहीं है।
इसलिए, व्यक्ति को अभक्त मन के साथ रहना होता है, जो सदैव हमारे लिए विभिन्न क्लेशों के साथ आता रहता है। किन्तु यदि कोई मन की इस प्रकृति को जानते हुए, इस प्रकार की मानसिक बकवास पर ध्यान देने के स्थान पर, पवित्र नाम के ध्वनि कंपन पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करता है तो वो आगे बढ़ता है।
आप देखते हैं कि बिना मंत्र जप के ध्यान बहुत कठिन है। और यह असफल होता है। यदि कोई व्यक्ति केवल बैठकर मंत्र के उपयोग के बिना, मंत्र की सहायता के बिना मन को एकाग्र करने का प्रयास कर रहा है। वो शीघ्र ही अपने आप को फिर से विचारों के सागर में डूबे हुए पाएगा।
किन्तु सौभाग्य से परम भगवान् इस दुनिया में, पवित्र ध्वनि कंपन के रूप में उतरते हैं, जिसका आश्रय लेकर, जो एक नौका के समान है जैसा कि नारद ने ठीक कहा है
एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहु: ।
भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम् ॥ श्री. भा. 1.५.३४ ॥
वे कहते हैं, यदि कोई बहुत ही ध्यानपूर्वक पवित्र नाम का आश्रय लेता है, तो पवित्र नाम का जप करते हुए व्यक्ति स्वयं को बहुत संरक्षित, बहुत आश्रित, बहुत व्यस्त, बहुत अवशोषित अनुभव करेगा। एक आदमी के समान, जो समुद्र में संघर्ष कर रहा है और अब तैरने में सक्षम नहीं है और अपनी जान गंवाने ही वाला है, वह डूबने और मरने वाला है। किन्तु उस समय कल्पना कीजिए कि यदि कोई नाव आती है और वह नाव पर चढ़ता है और वह शांति से नाव में आराम कर सकता है। क्योंकि कई बार हम पवित्र नाम के मूल्य को नहीं समझते हैं, तो हम इस नाव का आश्रय लेने में असमर्थ रहते हैं।
किन्तु आचार्यों ने इसे हमें गुरु परम्परा में सौंप दिया है और यदि कोई इसे बहुत गंभीरता से लेता है और पवित्र नाम का जप, मंत्र के बाद मंत्र, शब्द से शब्द सुनने की परियोजना को पालन करने का प्रयास करता है, तो कोई यह देखेगा कि मन लीन और शांत रहता है और इसके लिए व्यक्ति को सहनशीलता के गुण को विकसित करना होगा। यदि कोई मानसिक बकबक को सहन नहीं करता है और सोचता है कि जब तक मैं इस मानसिक बकबक को शांत नहीं करता, तब तक मैं कुछ और नहीं करूंगा। तब वो पथभ्रमित हो जाता है, उसे मन द्वारा मूर्ख बनाया जाएगा।
इसलिए, व्यक्ति को मानसिक बकबक की उपेक्षा करने और ध्यान न देने की कला सीखनी होगी और इससे ध्यान हटाना होगा और मधुर नाम के पवित्र ध्वनि कंपन पर ही ध्यान देना होगा, जो हमें शुद्ध करने और कृष्ण के चरण कमलों की ओर पुनः हमारा उत्थान करने के लिए एकमात्र आश्रय है।
हरिनाम पभु की जय !!!!!
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