जप प्रेरणा - जीव के लिए सबसे बड़ा अभिशाप - The Greatest Curse for Living Entity - 11 Jun 20 – Hindi Translation of Summary of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
जीव के लिए सबसे बड़ा अभिशाप
The Greatest Curse for Living Entity
जप प्रेरणा – 11 Jun 20 – Hindi Translation of Summary of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हम बात कर रहे थे कि किस प्रकार से यांत्रिक जप या कुछ योगिक प्रक्रियाओं द्वारा पवित्र नाम पर अधिकार नहीं किया जा सकता है। और पवित्र नाम और भगवान्, सूर्य के उदय के समान, केवल स्वेच्छा से अपनी कृपा से प्रकट होते है। सूर्य का उदय और अस्त होना किसी के हाथ में नहीं है। यह सूर्य का निर्णय है जब वो उगना चाहे। उसी प्रकार भगवान् का पवित्र नाम उनकी इच्छा के अनुसार स्वयं प्रकट होगा, और हम उन्हें यांत्रिक रूप से समझ नहीं पाएंगे। अब, भगवान हमारे ह्रदय में प्रकट होने के लिए, यह शास्त्रों के अध्ययन से भली प्रकार से जाना जाता है
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ भ. गी. ११.५३ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य (भ. गी. ११.५३) तो इस प्रकार के कई कथन हमें मिलते हैं, भक्त्या माम अभिजानाती (भ. गी. १८.५५)। और भगवान उद्धव को भी बताते हैं।
न साधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ श्री. भा. ११.१४.२० ॥
वे कहते हैं कि, मेरा ह्रदय योग, सांख्य, धर्म, स्वध्याय, तप, त्याग जैसी प्रक्रियाओं से प्रेरित नहीं होता है। इन सभी बातों से मेरा ह्रदय न तो आकर्षित नहीं होता है, जितना कि यथा भक्तिर्ममोर्जिता, वे कहते हैं, जितना भक्ति मेरे ह्रदय को आकर्षित करती है। जैसे कि कृष्ण स्वयं उद्धव को बता रहे हैं।
अतः इन सभी श्लोकों का अध्ययन करने के बाद एक बात स्पष्ट हो जाती है कि एकमात्र अवयव जो भगवान् वास्तव में जीव से अपेक्षा कर रहे हैं वो है भक्ति, और अन्य सभी अवयव यदि वे हैं तो उन्हें भी भेंट कीया जा सकता हैं, और यदि वे नहीं हैं, तब भी कोई समस्या नहीं है यदि भक्ति है, तो वो ही पर्याप्त है। भक्ति सबसे महत्वपूर्ण अवयव है।
तत्व ये है कि कृष्ण के संबंध में कुछ किया जाना चाहिए। यदि मेरे पास भक्ति नहीं है, तो मुझे विलाप करना चाहिए कि मेरे पास भक्ति नहीं है। और यदि मेरे पास थोड़ी भक्ति है, तो मैं उस छोटी भक्ति को अर्पित कर सकता हूं। और यदि मेरे पास इन सभी वस्तुओं में से कोई हैं वेदैर, तपस, दान और ये सभी अवयव हैं तो आप इन सभी को कृष्ण की सेवा में अर्पित कर सकते हैं। किन्तु केवल एक सबसे बड़ा अभिशाप है जो तब होता है जब कोई पूरी तरह से स्वार्थी हो जाता है और कृष्ण से अलग हो जाता है, कृष्ण के प्रति असावधान हो जाता है, और मैं, मुझे, मेरा की अपनी ही दुनिया में रहता है, वेण के समान। उन्हें भक्ति पाने का कोई अवसर नहीं है।
अतः, असावधानी की इतनी निंदा क्यों की जाती है, यह मुख्य कारण है, क्योंकि युधिष्ठिर ने सवाल पूछा, “आप कहते हैं कि कंस इतना अत्याचारी था और उसका उद्धार हो गया, क्यों? और वेण भी उनके जैसा ही था किन्तु उसे भक्ति क्यों नहीं दी गई? क्योंकि उन्होंने कहा कि वेण किसी भी तरह से कृष्ण से नहीं जुड़ा। वह कृष्ण से बहुत दूर चला गया, वह मैं, मुझे, मेरा की अपनी ही दुनिया में था। मैं स्वयं पूजित होना चाहता हूं। मैं सबसे बड़ा हूँ और ब्राह्मणों के यज्ञ को रोक देता हैं। इसलिए उसने कंस जैसे अत्याचार भी किए किन्तु कृष्ण से कोई संबंध नहीं है।
इसलिए, यदि हम एक सब्जी के समान अपनी चेतना रखें, कृष्ण के साथ कोई संबंध रखे बिना तो वो जीव के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। क्योंकि तब जीव के लिए किसी भी प्रकार से कृष्ण से जुड़ने की कोई भी संभावना नहीं है।
अतः, यह बात पवित्र नाम के जप में बहुत स्पष्ट होनी चाहिए, भले ही आप पवित्र नाम का जप करने में असमर्थ हों यदि आपके पास इसे स्वीकार करने की विनम्रता है और हम भगवान् से हमें न त्यागने के लिए विनती करते हैं, जैसे हम कहते है
नरोत्तम-दास कोय, ना थेलिहो रांगा पाये,
तोमा बिना के आछे आमार
यदि यह मनोदशा है तो इसे भी भक्ति के रूप में ही गिना जाता है, तो यह कितना अद्भुत है कि भले ही मेरे पास भक्ति न हो, किन्तु मैं विलाप करता हूँ कि मेरे पास भक्ति नहीं है, भगवान हमें स्वीकार करने के लिए अति दयालु हैं। ताकि धीरे-धीरे हम भक्ति के उस दृष्टिकोण को विकसित कर सकें और उनके लिए एक प्रसन्न करने वाले व्यक्ति बन सकें। अभी हम प्रसन्न कर पाने में समर्थ नहीं हो सकते, किन्तु हम विलाप कर सकते हैं कि हम उन्हें प्रसन्न नहीं कर पा रहे हैं तो भी हम उनकी शरण प्राप्त कर सकते हैं, और इसलिए इस मनोदशा को भगवान के समीप जाते हुए भूलना नहीं चाहिए, या तो भगवान् की पूजा करनी चाहिए या शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए या पवित्र नाम का जप करना चाहिए। क्योंकि भक्ति मार्ग बहुत सरल है, बहुत आसान है, किन्तु यदि इस मनोदशा को भुला दिया जाता है, तो हम उनसे अलग हो जाते हैं और अपने कार्यक्रम, इन्द्रिय संतुष्टि कार्यक्रम करते रहते हैं तब हम वास्तव में खो जाते हैं और हम बस स्थिर हो जाते हैं। और यदि हम ये ध्यान में रखते हैं तो हम धीरे धीरे भगवान के चरण कमलों की ओर सही दिशा में आगे बढ़ेंगे।
हरिनाम प्रभु की जय !!!
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