जप प्रेरणा - एक असुर, देवता और शुद्ध भक्त की मानसिकता - Mentality of a Asura, Devata and Pure Devotee - ४ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
एक असुर, देवता और शुद्ध भक्त की मानसिकताMentality of a Asura, Devata and Pure Devotee
*जप प्रेरणा - ३ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu*
हमारे आस-पास के जगत के लिए हमारा दृष्टिकोण हमारी आध्यात्मिक चेतना का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है। आप देखते हैं, शास्त्रों ने शुद्ध भक्तों के विषय में वर्णन किया है, फिर देवताओं के बारे में, फिर असुरों के बारे में।
जब समुंद्र मंथन में, भाग्य की देवी, रमा, लक्ष्मी, जब वह दूध सागर से निकली थी। जब देवता और असुरों ने उन्हें देखा, तो असुर उनसे आनंद लेना चाहते थे। वे उन्हें घूर रहे थे और देवता भी उन्हें देखा और उसकी सुंदरता की सराहना की। किंतु जैसा कि आचार्यों ने बताया है, दोनों में अंतर है। क्योंकि असुरों ने उसकी ओर देखा, जैसे कसाई गाय का मांस खाने के लिए गाय को देखता है। तो कसाई विचार कर सकता है जब वह बाजार में जाए कि कितना मांसयुक्त गाय हो तो मैं उसका आनंद ले सकता हूं, खा सकता हूं। जबकि माँ लक्ष्मी को देख देवता यही कहते हैं कि यदि वे मेरी ओर देखते हैं, तो मुझे इतनी संपत्ति मिल सकती है, मैं एक लोक का स्वामी बन सकता हूं। इसलिए इस तरह के रवैये के साथ, वे उन्हें एक किसान की तरह देख रहे थे, जो बाजार में जाता है, अलग-अलग गायों को देखता है और जाँचता है कि यह गाय कितना दूध दे सकती है ताकि मैं बाज़ार में बेच सकूँ और पैसे कमा सकूँ। तो वह लाभ के संदर्भ में सोच रहा है किंतु शुद्ध भक्त वे लक्ष्मी को देखते हैं, जैसे ब्राह्मण गाय को देखता है। ओह, यहाँ एक गाय, कामधेनु गाय है जो कृष्ण को बहुत प्रिय है। वह मुझे दूध देगी और मैं उसमें से घी बना सकता हूं और उसे भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए यज्ञ कुंड में डालूंगा। अब, इस तरह मैं उसे कृष्ण की सेवा में संलग्न कर सकता हूं, जैसा कि शुद्ध भक्त सोचते हैं।
तो असुर की दृष्टि, देवता की दृष्टि और शुद्ध भक्त की दृष्टि बिलकुल भिन्न है। हमारी दृष्टि को शुद्ध करने के लिए, असुर से लेकर राक्षस के प्रकार, और शुद्ध भक्त के प्रकार तक, कर्म योग, और ज्ञान योग, अष्टांग योग, भक्ति योग जैसी विभिन्न प्रक्रियाएं दी गई हैं। इसलिए जब तक दृष्टिकोण साफ नहीं हो जाता और शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक जीव इस दुनिया में उलझा रहता है, उसी पुरानी भौतिक मानसिकता के कारण, अपने स्वयं के सुखों के लिए शोषण करना चाहता है। तो, पवित्र नाम का जप हमारे लिए कठिन हो जाता है, विशेष रूप से दूषित मानसिकता के कारण, या तो आसुरिक मानसिकता या देवता मानसिकता, क्योंकि आसुरिक मानसिकता या शोषक मानसिकता और देवता मानसिकता भी व्यावसायिक मानसिकता है।
इसलिए, शुद्ध दृष्टि न होने के कारण, पवित्र नाम का जप आपके अशुद्ध मन के लिए बहुत पीड़ादायक हो सकता है। दूसरी ओर, शुद्ध मन वाला मन जैसे एक सुद्ध भक्त का होता है पवित्र नाम की महिमा में आनंद लेता है जैसे रूप गोस्वामी महिमामंडन करते हैं, और हरिदास ठाकुर भी महिमामंडन करते हुए पवित्र नाम की रूचि में मगन थे। जब व्यक्ति भोगी मानसिकता को त्यागता है और भगवान् का सेवक होने में आनंद लेता है।
इसलिए एकादशी जैसे दिन, अधिक से अधिक माला जपने का अच्छा अवसर है और भोगी मानसिकता को नष्ट करना, कम से कम इसे कम करने के लिए, हमारे लिए धीरे-धीरे अशुद्धता के रोग को मन से कम करने के लिए, स्वामित्व की इच्छा और शोषण और आनंद लेंने की इच्छा। क्योंकि इस भौतिक जगत में लाखों-करोड़ों जन्मों से बद्ध आत्मा का इतिहास रहा है और जिसके कारण वह भौतिक स्तर पर अटकी हुई है, खुद को उठाने में असमर्थ है, लेकिन पवित्र नाम एक बहुत ही तेज मुक्तिदाता के रूप में आया है कलियुग के इस अंधकारमय युग में। और यह गुरु परम्परा के माध्यम से आ रहा है और विशेष रूप से इसकी सर्व रोग निवारिणी, एनेछी औषधि माया नासिबारो लागी 'हरि-नाम महा-मंत्र लाओ तुमी मांगी', वह कहते हैं कि ये एक रामबाण दवा है।
जो कोई भी इस दवा में दृढ़ विश्वास विकसित करता है और इस दवा को स्वीकार करता है, वह अपने हृदय को शुद्ध कर लेगा और इस भोगी मानसिकता से मुक्त हो जाएगा और भगवान की शक्तियों को देखने और उन्हें भगवान् की सेवा में लगायेगा स्वयं को भगवान् का सेवक मानते हुए, और वो सही दृष्टि हमें शुद्ध करेगी और हमें भगवद्धाम तक हमारा उत्थान करेगी।
हरिनाम प्रभु की जय
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हरे कृष्ण,
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