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जप प्रेरणा - पवित्र नाम कलियुग से रक्षा करता है - Holyname Protects from Kaliyuga - 19 April 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu

पवित्र नाम कलियुग से रक्षा करता है

Holyname Protects from Kaliyuga

जप प्रेरणा - १९ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu


हरे कृष्ण।

श्रीमद्भागवतम् में इस युग की, जिसमें हम रह रहे हैं की प्रकृति के विषय में वर्णन विभिन्न स्थानों पर उपलब्ध है। आध्यात्मिक जीवन के मार्ग पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति परीक्षित महाराज, युधिष्ठिर महाराज के समान दुनिया को देखने में सक्षम होना चाहिए, वे सभी अपने आप को एक कालातीत विमान या अनन्त विमान पर स्थापित करते हुए किस प्रकार वे दुनिया को देखते थे। ये दुनिया कैसे चल रही है।

तो श्रीमद्भागवतम् में उल्लेख है कि कलियुग के इस युग में शक्ति ह्राषम होगा, शक्ति ह्राषम का अर्थ है, हर वस्तु की शक्ति कम हो जाएगी। उदाहरण के लिए, भूमि पहले की तरह इतनी पैदावार नहीं देगी, पहले के वर्षों में भूमि बहुत ही प्रचूर रूप से उत्पादन करती थी चाहे वह सब्जियां हों या फल या अनाज या दालें, वे बहुत कम उत्पादन करेंगे। इसलिए, लोग उर्वरक डालते है और अधिक पैदावार निकालने का प्रयास कर रहे हैं। इसी तरह, गाय उतना दूध नहीं देगी, जितना पहले देती थी। उसी तरह शक्ति ह्राषम का अर्थ ये भी है, मानव शरीर शक्तिहीन होगा, जो बहुत भंगुर होगा और जो प्रायः शीघ्र खंडित हो जाता है या कमियों और व्याधियों से सरलता से बाधित होता है, वह है शक्ति ह्राषम।

वो कहते हैं निसत्वाम, कलयुग में, लोग ज्यादातर रजोगुण और तमोगुण में होंगे। इसलिए, वे एक अतिसक्रिय मन या अकेलेपन या अवसाद से पीड़ित हैं और यह निसत्वाम है, उनके पास आध्यात्मिक जीवन की विनियमित प्रथाओं को गंभीरता से लेने की योग्यता नहीं है। बल्कि वे आसानी से इस युग में लुभाने वाले प्रलोभनों में पड़ जाते हैं। इसी तरह, वे कहते हैं कि केवल शक्ति ह्राषम ही नहीं, वह ह्रषित आयुष कहते हैं, ह्रषित आयुष का अर्थ है कि इस युग में मनुष्य का जीवनकाल बहुत कम हो गया है। वे सौ को भी नहीं छूएंगे, इससे पहले कि लोग अपने शरीर को छोड़ दें, ह्रषित आयुष। तो शक्ति हर्षम, ह्रषित आयुष और अश्रद्धाधाना, जिसका अर्थ है, वे वास्तव में अज्ञानी होंगे, वे मूल आध्यात्मिकता या यहां तक कि मूल संस्कृत से भी पूरी तरह अनभिज्ञ होंगे। लेकिन उनकी एकमात्र बड़ी अयोग्यता यह है कि वे आध्यात्मिकता से जुड़ी किसी भी बात में विशवास विकसित नहीं करेंगे। उन्हें इन्द्रिय तृप्ति में विश्वास होगा, उन्हें माया में विश्वास होगा, लेकिन वे भगवान में विश्वास नहीं करेंगे, शास्त्रों में विश्वास नहीं करेंगे, अश्रद्धाधाना कहते हैं।

इसी प्रकार, दुरमेधा, दुरमेधा का अर्थ है कि बुद्धि विकृत हो जाएगी। वे अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग इंद्रिय भोग के लिए कुटिल योजना बनाने में करेंगे और वे आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए बुद्धिमत्ता का उपयोग कभी नहीं करेंगे। और दुर्भगान, दुर्भगान का अर्थ है कलीयुग बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि इतने सारे अलग-अलग प्रकार के इतने सारे लोग होंगे जो इन लोगों को अलग-अलग अनुपयोगी उत्पादों के विज्ञापनों और बिक्री करके धोखा देंगे। और कलियुग के जीवों के पास जो भी थोड़े बहुत पैसे हैं, वे अनुपयोगी वस्तुओं को खरीदने में खर्च करते हैं, जो कभी भी उन्हें प्रसन्नता नहीं देगा।

इस तरह से, ह्रषित आयुष, शक्ति ह्राषम, दुर्भगान, दुरमेधा, अश्रद्धाधाना, इस तरह से इन सभी शब्दों का उपयोग किया जाता है। उसी प्रकार अन्य श्लोक भी हैं

ततश्चानुदिनं धर्म: सत्यं शौचं क्षमा दया ।
कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृति: ॥ श्री. भा. १२.२.१ ॥

आयु, बालम, स्मृति ये सभी कम हो जाती हैं।

इस प्रकार, हम यह सब सुनकर क्या अनुमान लगाते हैं? क्योंकि हम इस युग में रह रहे हैं, और इसकी भविष्यवाणी 5000 साल पहले वेद व्यास ने की थी और उन्होंने श्रीमद्भागवतम् में लिख दिया था। इसलिए, आप देख सकते हैं कि भविष्य के विषय में शास्त्रों में भविष्यवाणी कैसे हो सकती है, पांच हजार साल पहले। इसलिए जब हम इन बातों को देखते हैं तो हमें पता होना चाहिए कि भागवतम एक वास्तविकता बन रहा है, सत्य और वही भागवतम् हमें एक समाचार पत्र के समान आपको निराशाजनक जानकारी देकर और आपको कोई भी सकारात्मक ज्ञान या सकारात्मक जानकारी दिए बिना नहीं छोड़ देता है। भागवतम हमें ऐसे नहीं छोड़ता, भागवतम कहता है कि कलयुग में सबसे अच्छी बात यह है कि कलियुग की इन सभी कमियों को आसानी से मिटा दिया जा सकता है

यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते ॥ श्री. भा. ११.५.३६ ॥

भागवतम कहता है कि महान आत्माएं कलियुग का महिमा मंडन करती हैं

कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञा: सारभागिन: ।
यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते ॥ श्री. भा. ११.५.३६ ॥

कलियुग में पवित्र नाम जप से ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। सभी भौतिक आवश्यकताएं, आध्यात्मिक आवश्यकताएं, कोई भी आवश्यकता जिसके विषय में आप कभी भी सोच सकते हैं वो केवल पवित्र नाम का जप करके आसानी से प्राप्त किया जा सकता है जो की केवल एक अच्छी गुणवत्ता है।

अस्ति ह्येको महान् गुण: ।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्ग: परं व्रजेत् ॥ श्री. भा. १२.३.५१ ॥

इसलिए, भगवान ने हमारे जैसे कलियुग जीवों पर बहुत दया की, कि हमसे कोई बड़ी मांग नहीं की, किंतु उन्होंने एक भागवतम के पाठ के माध्यम से और पवित्र नाम जप और भगवान की महिमा का जप करने की एक बहुत ही सरल प्रक्रिया रखी है और इन दो मूल प्रथाओं के द्वारा हम हमारे आध्यात्मिक जीवन में सुरक्षित रहतें हैं, और इस प्रकार, कलियुग के प्रदूषणकारी प्रभावों के साथ-साथ इन सभी कमियों से कोई भी अछूता या अदुषित रह सकता है। एक भक्त को इन कमियों के विषय में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है जब तक कि भक्त निष्कपटता से और गंभीरता से पवित्र नाम का जप कर रहा है और पवित्र प्रसिद्धि सुन रहा है।

हरिनाम प्रभु की जय!
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हरे कृष्ण,

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