जप प्रेरणा - द्वंद्व हमें कृष्ण से दूर रखते हैं - Dualities Keep us Away from Krishna - 27 April 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
द्वंद्व हमें कृष्ण से दूर रखते हैं
Dualities Keep us Away from Krishna
जप प्रेरणा - 27 अप्रैल 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हरे कृष्ण।
जब हम पवित्र नाम का जप करते हैं, तो कृष्ण की उपस्थिति को समझना हमारे लिए कठिन क्यों होता है? पहली समस्या यह है कि जीव भौतिक परिचय की चेतना से घिरा है, जिसका अर्थ है जैसे ये श्लोक कहता है
यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके
स्वधी: कलत्रादिषु भौम इज्यधी: ।
यत्तीर्थबुद्धि: सलिले न कर्हिचि-
ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखर: ॥ श्री. भा. १०.८४.१३ ॥
अपने आप को मांस और हड्डियों से बने शरीर के साथ परिचित होना, केवल अपने सम्बन्धियों और मित्रों के साथ परिचित होना, और जाति और समुदाय से परिचय रखना और स्वयं के जन्म स्थान के साथ परिचय रखना, और पवित्र स्थानों की यात्रा केवल एक दर्शनीय स्थल, या एक अनुष्ठान के रूप में करना, इन सभी बातों को शारीरिक चेतना माना जाता है। और व्यक्ति को गाय या गधा कहा जाता है।
इस प्रकार के भौतिक परिचय आम तौर पर एक जीव के चलते हैं जब तक कि द्वंद्व अस्तित्व में है। तो द्वंद्वों का अर्थ है शीत उष्ण, सुख दुःख, मान अपमान, जय पराजय, लाभ अलाभ। तो इस प्रकार के द्वंद्व, जीव को, उसकी शारीरिक परिचय में निरंतर व्याप्त रखते हैं। और इस तरह से अनेकों जन्मों तक यह लंबे समय तक चलता है। यही कारण है कि ज्ञानी द्वंद्वों से मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं, ताकि हम शारीरिक चेतना को तोड़ सकें और स्वयं का उत्थान कर सकें, और स्वयं को आत्मा या स्वयं होने का अनुभव कर सकें न कि शरीर।
तो, यदि कोई यह अनुभव करने के लिए प्रयास करता है कि मैं शरीर नहीं हूं, मैं आत्मा हूं, अहम् ब्रह्मास्मि, अहम् ब्रह्मास्मि। अतः द्वंद्व से ऊपर उठकर उस बोध में आने में उन्हें लंबा समय लगता है। किन्तु तब भी वे कृष्ण तक नहीं पहुँच सकते। क्यों? क्योंकि उन्हें अपने शास्त्रों के विषय में अपने ज्ञान पर अधिक विश्वास है और उन्हें लगता है कि वे अपनी समझदारी से भगवान को समझ सकते हैं, इसलिए इसे अविशुद्धबुद्धय: कहा जाता है। भगवत गीता में कृष्ण उन्हें अबुध्यः कहते हैं, भागवतम में इसे अविशुद्धबुद्धय: कहते हैं, चाहे आप उन्हें न बुद्धिमत्ता कहें या अशुद्ध बुद्धि। क्यों? क्योंकि वे अपने स्वयं के मानसिक अटकलों का उपयोग करने का प्रयास करते हैं, ताकि पूर्ण सत्य को समझा जा सके। इसलिए वे केवल बहुत बड़े आकार के प्रकाश को देखते हैं, और केवल उसी तक वे आ पाते हैं। उन्होंने द्वंद्व को छोड़ दिया, द्वंद्व से ऊपर उठ गए, और वे सत्य को देखने का प्रयास कर रहे हैं। वे यह देखने में सक्षम हैं कि परम सत्य बहुत ही प्रभावशाली प्रकाश है और वे पूरी तरह से उस प्रकाश की पहचान कर रहे हैं और द्वंद्वों से बहुत आराम अनुभव कर रहे हैं और वे कुछ संतुष्टि अनुभव करते हैं, पर वे उससे आगे नहीं जा सकते।
क्योंकि कृष्ण उस प्रकार की योग माया से आच्छादित हैं, जो श्यामसुंदर के सुंदर व्यक्तित्व को किसी को नहीं देखने देती है। फिर उस सुंदर रूप को देखने के लिए कौन पहुंचेगा? सेवोंमुखे ही जिव्य्हादौ स्वयं एव स्फुरतिअदह, यदि कोई गुरु परम्परा से श्रवण करके कृष्ण के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है और पूर्ण ज्ञान में समर्पण की ओर जाता है और वह समर्पण भक्ति करने के लिए करता है। तो इस प्रकार, कृष्ण के विषय में ज्ञान, सम्बन्ध ज्ञान और आत्मसमर्पण करने के लिए कृष्ण को समझने के लिए कि वे सब कुछ है वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो और वासुदेव: सर्वमिति। उस समर्पण के साथ जब कोई वैष्णवों के अधीन गुरु परम्परा में पूर्ण विश्वास के साथ भक्ति करने लगता है, तो वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। व्यक्ति सरलता से द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है और फिर भगवान् के उस सुंदर रूप को देखने पाता है।
उदाहरण के लिए, हम तुलसी की पूजा कर रहे हैं, हम नरसिंह देव की पूजा करते हैं, हम आध्यात्मिक गुरु की पूजा कर रहे हैं। तो हमारी नग्न आँखों से, हम उनमें से किसी को भी नहीं देख पाते हैं। किन्तु हमें गुरु परम्परा में दिए गए ज्ञान पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि जब हम गीत गा रहे होते हैं, तब व्यक्तित्व मौजूद होता है, और व्यक्तित्व हमारी पूजा और प्रार्थना स्वीकार कर रहा होता है, और व्यक्तित्व हमें आशीर्वाद दे रहा होता है। और इस प्रकार वह हमें शुद्ध कर रहा होता है।
जिस स्तर तक, आप गुरु परम्परा में विश्वास रखते हैं और इस ज्ञान को अपने ह्रदय से स्वीकार करते हैं, और फिर वह ज्ञान आत्मसमर्पण के लिए सहायक होता है और समर्पण के साथ भक्ति की गतिविधियों के साथ संयुक्त होता है भक्ति सेवा सेवोंमुखे ही जिव्य्हादौ स्वयं एव स्फुरतिअदह, जिसका अर्थ है तुरंत कृष्ण प्रकट हो जाते हैं क्योंकि कृष्ण स्वयं को प्रकट करने का निर्णय करते हैं जब हम पवित्र नाम का जप करते हैं, या जब हम पवित्र नाम गाते हैं और नृत्य करते हैं, या जब हम विभिन्न प्रकार की भक्ति अर्पित करते हैं। तो, यह बहुत स्पष्ट हो जाता है।
जैसे सुबह का सूरज आकाश में उगता है और स्वयं को सभी के लिए प्रकट करता है, इसी प्रकार कृष्ण को हमारे हृदय में जागृत करना है और प्रकट करना है और इसका क्या प्रमाण है? एक भक्त जो कृष्ण का रहस्योद्घाटन पा रहा है उसे अपने आध्यात्मिक जीवन में बहुत प्रोत्साहन मिलेगा। ठीक उस आदमी के समान जो बहुत भूखा होता है पर खाना खाने के बाद वह बहुत संतुष्टि अनुभव करता है। उसी प्रकार, एक भक्त अनुभव करता है, न केवल संतुष्टि वह बहुत बहुत प्रसन्नता अनुभव करता है जैसे कि उसने कुछ पाया है जो कि पाया जाना बहुत दुर्लभ है। मानो उसे सबसे मूल्यवान निधि मिल गई हो, जो अब उसके पास है। तो भक्त को किसी भी भौतिक इन्द्रिय तृप्ति से कोई सरोकार नहीं रहता है। और भक्त अधिक से अधिक भगवान के पास जाना चाहते हैं, और अधिक समर्पण करते हैं और अपने ज्ञान को अधिक बढ़ाते हैं, अधिक आत्मसमर्पण करते हैं और अपनी भक्ति को अधिक बढाते हैं, जैसा कि मैंने आपको ये तीन बातें बताई हैं। ज्ञान, समर्पण और भक्ति, ये सभी बातें न केवल हमें भौतिक स्तर से मुक्त करती हैं, ये हमें भगवान् की दया से आध्यात्मिक स्तर पर अधिक से अधिक आध्यात्मिक सत्य का पता चलता है, जिनके रहस्योद्घाटन के बिना हम बस इस जगत में अंधे हैं। हमारे पास कुछ भी आध्यात्मिक समझ पाने की कोई क्षमता नहीं है। यह केवल उनकी कृपा से है कि जब वे स्वयं हमें दर्शन देते हैं, तो हम उन्हें समझ पाएंगे।
और पवित्र नाम का जप वास्तव में कुछ ऐसा है जो हमें श्रद्धा का पुरस्कार भी देगा, यही सुंदरता है। भले ही कोई व्यक्ति कम श्रद्धा के साथ आध्यात्मिक जीवन का आरम्भ करता है, किन्तु जब शुद्धिकरण होता है तो समर्पण होता है, तो ये सभी बातें दैनिक, श्रद्धापूर्वक पवित्र नाम का जप, विश्वास के साथ करने से बढ़ता जाता है और एक दिन परिणाम आएगा। उस श्रद्धा के साथ, व्यक्ति को पवित्र नाम का जप करते रहना चाहिए।
हरिनाम प्रभु की जय!
=================================================
हरे कृष्ण,
इस्कॉन पुणे से जप प्रवचन/पुस्तक अंश के रूप में दैनिक जप प्रेरणा (अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा में अनुलेख और अनुवाद के साथ), साझा करने के लिए समूह।
समूह से जुड़ने के लिये इस लिंक को अपने मोबाइल में खोलें:
(यदि आप पहले से किसी भी "हरैर नामैव केवलम् - HNK" समूह से जुडें हैं तो कृपया इस लिंक को क्लिक न करें)
=================================================

Comments
Post a Comment