जप प्रेरणा - ढृढ़ श्रद्धा के साथ जप करें कि कृष्ण सर्वोच्च हैं - Chant with Firm Faith that Krishna is the Supreme - १३ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
ढृढ़ श्रद्धा के साथ जप करें कि कृष्ण सर्वोच्च हैं
Chant with Firm Faith that Krishna is the Supreme
जप प्रेरणा - १३ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
भगवद गीता में, भक्ति खंड में, नौवें अध्याय में कृष्ण ने कहा, इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे, मैं आपको सबसे गुह्य रहस्य दे रहा हूं, नौवें अध्याय में। जबकि भगवद गीता के 15 वें अध्याय में, फिर से कृष्ण कहते हैं, इति गुह्यतमं शास्त्रम, जिसका अर्थ है ज्ञान खंड, जो 13 से 18 अध्याय है, उसमे भी वे कह रहे हैं कि सभी धर्मग्रंथों में, वेदांत सूत्र सबसे ऊपर है और वे कहते हैं, इति गुह्यतमं शास्त्रम और वेदांत के सिद्धांतों के बीच, वे कहते हैं, मैं सबसे अधिक गुप्त रहस्य आपको यहाँ त्रिश्लोकी भगवद गीता में दे रहा हूँ। इससे पहले भक्ति खंड में चतुश्लोकी भगवद् गीता थी। इसी प्रकार 13 से 18 अध्यायों के बीच ज्ञान खंड में त्रिश्लोकी भगवद गीता है। तो इसके अंत में, वह कहते हैं
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ भ. गी. १५.२० ॥
वे बता रहे हैं कि सभी शाश्त्रों के ज्ञानमें जो कि कोई जान सकता है उस सब में सबसे अधिक रहस्यपूर्ण बात मैं आपको इस त्रिस्लोकी गीता में बता रहा हूँ, यह क्या है? त्रिश्लोकी गीता इस सत्य को बताती है कि दो जीव हैं क्षर और अक्षर, पतनशील और अपतनशील। और इन दोनों के ऊपर सर्वोच्च भगवान कृष्ण हैं।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम: ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम: ॥ भ. गी. १५.१८ ॥
यह एक तीसरा श्लोक है जो कहता है कि मैं पतित और मुक्त दोनों आत्माओं से परे हूँ। और इसलिए मैं सभी वैदिक साहित्य में पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता हूँ, वे कहते हैं।
तो जगत के अधिकांश लोग इस वास्तविकता की अज्ञानता में भटक रहे हैं, वे नहीं जानते कि पतनशील जीव हैं और उनके ऊपर मुक्त जीव हैं और उन दोनों के ऊपर, पुरुषोत्तम सर्वोच्च भगवान् हैं। फिर ज्ञानी और योगी हैं जो स्वयं के प्रबुद्ध होने की कल्पना करते हैं, जीव को भगवान के साथ एक मानते हुए, वे भगवान में किसी प्रकार के विलय पर विचार करते हैं। तो ज्ञान होने के बाद भी यह एक और प्रकार का अज्ञान है।
इसलिए, भगवान कृष्ण यहां सबसे उच्च रहस्य को उजागर करते हैं। अगर कोई जीव मूर्खता से स्वयं को ईश्वर के साथ एक मानता है, तो वह कभी भी ईश्वर के सामने समर्पण नहीं कर पाएगा। इसलिए, उसे इस वास्तविकता को जानना होगा, कि भले ही मैं मुक्त हो जाऊं, फिर भी मैं कृष्ण के अधीन रहूंगा। वे कहते हैं कि यह ज्ञान इतना शक्तिशाली है, कि भले ही सभी वेदों का अध्ययन नहीं किया है, फिर भी उन्हें एक सर्वविद, सब कुछ जानने वाला माना जाता है, क्यों? क्योंकि वह वेदों का सार जानता है, इसलिए सब कुछ जानने वाला माना जाता है।
इसी तरह, भले ही कोई नया भक्त हो, उसे ज्ञानियों, योगियों और कर्मियों उन सब से उत्तम माना जाता है, क्यों? क्योंकि वह इस सत्य को जानता है, वह कृष्ण के विषय में यह सत्य जानता है कि कृष्ण भगवान हैं और सभी जीव उनके सेवक हैं। इसलिए, आप देखेंगे, वे कह रहे हैं
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ भ. गी. १५.१९ ॥
वे बता रहे हैं, वह व्यक्ति जो इस सच्चाई को बिना किसी भ्रम के जानता है, यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्, जिन्होंने यह दृढ़ विश्वास विकसित किया है कि कृष्ण सर्वोच्च भगवान हैं, मैं उनका शाश्वत सेवक हूँ, भले ही वो बद्ध या मुक्त अवस्था में हों, और मैं सदा सेवक रहूँगा, सर्व-विद, वह सब कुछ जानने वाला हैं। भले ही उन्होंने सभी धर्मग्रंथों का अध्ययन नहीं किया है, किंतु क्योंकि वे शास्त्रों के सार को जानते हैं, भले ही वह बहुत उन्नत भक्त न हो, भले ही वह एक नवजात भक्त हो, योगी ज्ञानियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वह यह मूलभूत सत्य जानता है, वह पूरी निष्ठा से भक्ति में संलग्न हो सकता है।
तो यहाँ कृष्ण के लिए हमारे समर्पण को उत्तम बनाने का सूत्र है। कैसे? यदि हम कृष्ण के परम भगवान् होने में ढृढ़ आस्था विकसित करें, जो पतित और मुक्त आत्माओं के ऊपर हैं और हम सभी उनके शाश्वत सेवक हैं, तो इस ज्ञान पर हमारी बुद्धि की स्थिरता हमें कृष्ण के चरण कमलों में समर्पित कर देगी और कृष्ण को सभी कुछ संभालने देगी और हम कृष्ण को नियंत्रण सौपने में सक्षम होंगे और उनके पवित्र नाम का जप करने और उनके चरण कमलों में दृढ़ आश्रय लेने के लिए किसी भी व्याकुलता से मुक्त होंगे।
वे कहते हैं कि सर्व-विद्, ऐसा भक्त सभी कुछ जानता है। वे कहते हैं कि वह सब कुछ जानता है क्योंकि वह शाश्त्रों का सबसे आवश्यक हिस्सा जानता है इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ, वह शाश्त्रों का सबसे गोपनीय भाग जानता है। तो इस प्रकार, कृष्ण यह रहस्योद्घाटन कर रहे हैं कि कैसे किसी को अपनी स्थिति को समझकर और उनके चरण कमलों का आश्रय लेकर मन को सभी चिंताओं से मुक्त करना चाहिए।
हरिनाम प्रभु की जय!
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हरे कृष्ण,
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