जप प्रेरणा - Chant Submissively to Counteract Frustration - निराशा हटाने के लिए विनम्रतापूर्वक जप करें - 24 April 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
Chant Submissively to Counteract Frustration निराशा हटाने के लिए विनम्रतापूर्वक जप करें
जप प्रेरणा - 24 अप्रैल 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
हरे कृष्ण,
कई लोगों द्वारा सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्नों में से एक, विशेष रूप से आधुनिक समय में, ये है कि क्या ऐसी कोई संभावना है कि भगवान मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त कर कर दें? मैं भौतिक जगत में कोई भूमिका नहीं निभाना चाहता, न ही मैं आध्यात्मिक जगत में कोई भूमिका निभाना चाहता हूं। भगवान को मुझे पूरी तरह से अकेला छोड़ देना चाहिए और मेरे अस्तित्व को समाप्त कर देना चाहिए, ताकि मुझे कोई चिंता न हो। यह बहुत ही सामान्य बात है। कई युवा यह सवाल पूछते हैं। इस प्रश्न का मुख्य कारण यह है, कि यह क्यों उत्पन्न होता है, यदि आप देखते हैं कि इस प्रश्न के पीछे जो दृष्टिकोण है, भौतिक जगत शुद्धिकरण का एक स्थान है।
जैसे आप स्कूल या कॉलेज जाते हैं, केवल पूरे दिन खेलने के लिए नहीं, बल्कि आपको पढ़ाई करनी है। इसी तरह, भौतिक जगत केवल जीवों की इन्द्रियतृप्ति के लिए व्यवस्थित जगह नहीं है, अपितु यह उनके ह्रदय के सुधार के लिए है। इसलिए, शास्त्र दिए गए हैं, गुरु परम्परा में गुरु हैं और भक्ति की विधियाँ हैं, जिनका उद्देश्य जीव की शुद्धि और उत्थान है। तो, ये अक्सर जीवों द्वारा पसंद नहीं किए जाते हैं, वे स्वतंत्र रूप से, हर दिन, पूरे दिन, हर पल सभी क्षण बिना किसी प्रतिबंध के इन्द्रिय तृप्ति करना चाहते हैं। इसलिए, जब कोई देखता है कि ओह, यहाँ शुद्धिकरण है, मुझे यह स्थान पसंद नहीं है। और फिर जब कोई आध्यात्मिक जगत में जाता है, तो वहां भी उसे लाखों जीवों के साथ कृष्ण की सेवा करनी पड़ती है, और कृष्ण को केंद्र में रखना होता है और यह एक बद्ध आत्मा के लिए, जो सदैव स्वयं को केंद्र में देखना चाहता है जहाँ हर कोई उसकी सेवा करे। तो फिर उसे आध्यात्मिक जगत में जाने से भी चिढ़ है।
तो इस तरह, वह समझता है कि उसका दृष्टिकोण भौतिक जगत या आध्यात्मिक जगत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए वह अपने अस्तित्व को समाप्त करने की इच्छा रखता है और किसी भी व्यक्तिगत संबंधों या किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी तरह के व्यक्तिगत आदान-प्रदान के इस पूरे प्रपंच से छुटकारा पाना चाहता है। श्रील प्रभुपाद इसका वर्णन ४.१० के तात्पर्य में करते हैं,
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ भ. गी. ४.१० ॥
वहाँ वे कहते हैं कि इस प्रकार के लोग होते हैं। वास्तव में ऐसे लोग सबसे अधिक निराश लोग होते हैं। वे कभी भी प्रसन्न नहीं होते हैं क्योंकि वे भगवान के साथ सम्बन्ध को नकारने का प्रयास कर रहे हैं, वे अधिक से अधिक पीड़ित होते हैं। और यह भी कि वे वास्तव में भगवान की भूमिका निभाना चाहते हैं, भगवान केवल एक ही है जो स्वतंत्र है। यदि आप एक नागरिक के रूप में देश में रह रहे हैं, तो आपको राज्य के कानूनों का पालन करना होगा। और यदि आप राज्य के कानूनों को तोड़ते हैं तो आपको जेल में डाल दिया जाता है, जहां आप जेल के कानूनों का पालन करते हैं। तो, कभी कोई अत्यधिक व्याकुल होता है कि ओह, मुझे जेल के नियमों का पालन करना है, फिर मुझे राज्य के नियमों का पालन करना होगा तो मैं दोनों स्थानों को पसंद नहीं करता। तो आपको कहां रहना है? वह कहते हैं कि मैं एक ऐसे स्थान पर रहना चाहता हूं, जहां मुझे किसी भी कानून का पालन नहीं करना पड़े, और यह संभव नहीं है।
तो, अंततः, कौन पूरी तरह से स्वतंत्र है? प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और ऐसे शीर्ष लोग को राज्य के नियमों का पालन नहीं करने के लिए कुछ स्वतंत्रता दी जाती है। उदाहरण के लिए, वे वास्तव में विपरीत दिशा में एक तरफी सड़क पर जा सकते हैं। कभी-कभी लाल सिग्नल होने पर भी वे पार कर सकते हैं। ऐसी सुविधाएं उन लोगों के लिए दी जाती हैं जो पूरी तरह से राष्ट्र के लिए समर्पित हैं। और वे चौबीस घंटे सात दिन व्यस्त हैं उनके लिए आम नागरिकों की तुलना में अधिक स्वतंत्रता दी गई है। इसी तरह, भगवान और उनके शुद्ध भक्तों को अधिक स्वतंत्रता है। भगवान् को तो पूर्ण स्वतंत्रता है। और शुद्ध भक्तों को भी जैसे नारद और अन्य लोगों को भी अधिक स्वतंत्रता है, क्योंकि वे पूरी तरह से भगवान के साथ संरेखित हैं। तो जो व्यक्ति पूछ रहा है, मैं राज्य या जेल में नहीं रहना चाहता, वह पूरी तरह से भगवान के आदेश का पालन नहीं करना चाहता। और तब आपको वह स्वतंत्रता कैसे मिलेगी?
इसलिए, यदि कोई निराशा की स्थिति से पूर्ण रूप में बाहर आना चाहता है, तो सर्व प्रथम व्यक्ति को विनम्र बनना चाहिए, व्यक्ति को विनम्र बनना होगा। मुझे मानना पड़ेगा कि मैं अज्ञानी हूं। और मुझे कुछ भी पता नहीं है। और निष्कपटता से अभ्यास करने वाले और उपदेश देने वाले कृष्ण भक्तों के लिए, संत भक्तों के लिए सम्मान होना चाहिए, आपको शास्त्रों के लिए सम्मान होना चाहिए। आपको भक्ति की विधियों के लिए सम्मान होना चाहिए। और फिर उसके सुनने और सीखने के लिए कुछ आशा है।
इसलिए, यहां तक कि अगर किसी के पास इन सभी बातों में से कुछ भी नहीं है जो मैंने अभी बताया। तो भी बस व्यक्ति को पवित्र नाम के जप में विश्वास रखना होगा। यदि कोई पवित्र नाम का जप करता है, तो धीरे-धीरे उसे शुद्ध किया जाएगा, एक ऐसे स्तर पर लाया जाएगा जहां सुनने के लिए वह पर्याप्त रूप से विनम्र होगा। और जब कोई सुनता है तो धीरे-धीरे सम्बन्ध को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जो इच्छा और द्वेष के कारण वह लंबे समय से भूल गया है। और इस प्रकार, कृष्ण और जीव के बीच का संबंध सुगंधित, ताजे गुलाबों से भरे बगीचे जैसा है। लेकिन व्यक्ति ने उस रिश्ते के विषय में इतनी मूर्खतापूर्ण और मिथ्या समझ विकसित की है, कि इसके प्रति एक डर विकसित कर लिया है, जैसे कि एक बिल्ली जिसने गर्म दूध के लिए एक भय विकसित किया है।
तो, भक्तों की सेवा करके और उनसे प्रेरणा लेकर, और पवित्र नाम जपते हुए, धीरे-धीरे ह्रदय का शुद्धिकरण करके इस डर से मुक्ति पानी होगी। इसलिए ये बात बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आज के समय में, जहां टूटे हुए रिश्ते हैं, और मिथ्या सम्बन्ध हैं, तो कोई भी भगवान को मिथ्या समझ सकता है। इसलिए, श्रील प्रभुपाद ने 4.10 में इस बात को स्पष्ट किया ताकि हम कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंधों में रुचि विकसित कर सकें, और फिर आवश्यकता है कि अंततः उस सम्बन्ध को पुनर्जीवित करें और इसे पोषण दें, इसे सींचे और इसे उस स्तर तक विकसित करें जहां हम आनंदपूर्वक स्थापित हो सकें।
हरिनाम प्रभु की जय !!!!!!
=================================================
हरे कृष्ण,
इस्कॉन पुणे से जप प्रवचन/पुस्तक अंश के रूप में दैनिक जप प्रेरणा (अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा में अनुलेख और अनुवाद के साथ), साझा करने के लिए समूह।
समूह से जुड़ने के लिये इस लिंक को अपने मोबाइल में खोलें:
(यदि आप पहले से किसी भी "हरैर नामैव केवलम् - HNK" समूह से जुडें हैं तो कृपया इस लिंक को क्लिक न करें)
=================================================

Comments
Post a Comment