जप प्रेरणा - गुरु और कृष्ण की प्रसन्नता के लिए निष्कपटता से जप करें - Chant Sincerely to Please Guru and Krishna - 15 April 20 – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu
गुरु और कृष्ण की प्रसन्नता के लिए निष्कपटता से जप करें
Chant Sincerely to Please Guru and Krishna
*जप प्रेरणा - १५ अप्रैल २० – Hindi Translation of Japa Talk by His Grace Radheshyam Prabhu*
हरे कृष्ण।जैसा कि मैं कल कह रहा था, सर्वोच्च भगवान् श्री कृष्ण ने गुरु परम्परा के माध्यम से अपने वर्चस्व और कृष्ण के विषय में ज्ञान सुलभ कराया है कि कृष्ण सब कुछ का कारण और सार हैं और सर्व श्रेष्ठ हैं, सभी विष्णुओं का स्रोत हैं, विश्वरूप का स्रोत हैं और उनके शुद्ध भक्त उनसे कैसे संबंधित हैं। और भौतिक जगत के इस उलटे पेड़ को कैसे काटना चाहिए और वापस भगवद्धाम में जाना चाहिए। ज्ञान की तलवार का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए जो कृष्ण स्वयं हमें दे रहे हैं जिसके साथ आप भौतिक अस्तित्व के इस उलटे पेड़ को काट सकते हैं।
तो सारा ज्ञान उपलब्ध है। तो जीव को अनुचित प्रकार व्यवहार करने का कारण है भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के साथ संपर्क। जब जीव को कृष्ण से अलग आनंद लेने की इच्छा विकसित होती है तो तीनों गुण उसे भोग के लिए वस्तुएं प्रदान करने लगते हैं। और भौतिक जगत में इन चमचमाती वस्तुओं का पीछा करते हुए जीव भूल जाता है और वह चार दोषों से भर जाता है और रजोगुण, तमोगुण जैसे निम्न गुणों में से एक से पीड़ित हो जाता है। और जीव एक रोगग्रस्त जीव बन जाता है। फिर जीव भुक्ति, मुक्ति, सिद्धि इन इच्छाओं के साथ रहने वाली बीमारियों के साथ भटकते, भटकते, भटकते, गोल-गोल, करोड़ों जन्मों के लिए भौतिक संसार में चक्कर लगाता है।
तो इस चक्कर से स्वयं को निकालने के लिए, इस भूत बाधित स्थिति से बाहर, पिशाच पाइले यत मत चिन्ह हय, यह कहा जाता है, जैसे भूत प्रेत से बाधित आदमी कुछ भी बोलता है और कुछ भी मूर्खतापूर्ण करता है। इसी प्रकार बद्ध आत्मा भी इस भौतिक संसार में मूर्खतापूर्ण तरीके से बोलती है और कार्य करती है, स्वयं को पीड़ित करती है और दूसरों को भी दुख पहुंचाती है। तो अपनी बद्ध अवस्था की इस भूतिया स्थिति से बाहर हम कैसे निकलें?
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है। केवल परमपिता परमात्मा चारों दोषों से मुक्त है। इसलिए, केवल वे उस ज्ञान को दे सकते हैं जो कि गुणों से प्रभावित नहीं है, शुद्ध ज्ञान, वास्तविक ज्ञान, अपरिवर्तनीय ज्ञान, शाश्वत ज्ञान, चिरस्थायी ज्ञान, जो सभी ज्ञानों का राजा हैं। तो हमें इसे आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से गुरु परम्परा में सुनना होगा, और उनकी शिक्षाओं में, और उनके निर्देश और मार्गदर्शन में बहुत दृढ़ विश्वास विकसित करना होगा। और मन को एक तरफ रखना होगा, जो गुणों से पीड़ित है। गुणों से पीड़ित मन वैसा ही है जैसे मेरे पास ऐनक है। कल्पना कीजिए अगर यह चश्मा, मैं तेल को छूता हूं और फिर चश्मा छूता हूं, तो चश्मा गन्दा हो जाता है, तो वो चश्मा पहनकर आप बहुत स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं, जब तक कि चश्मा साफ न हो। इसी प्रकार, रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण के संपर्क से हमारी दृष्टि विकृत हो गई है।
इसलिए भौतिक जगत के विषय में हमारे अपने दृष्टिकोण को गंभीरता से नहीं लेना है, किंतु उस दृष्टिकोण को गंभीरता से ग्रहण हुए जो कि कृष्ण हमें गुरु परम्परा के माध्यम पुरुस्कार दे रहे हैं, और उस पर श्रद्धा रखते हुए, तो व्यक्ति अपने आप को निचले स्तरों, विशेष रूप से निचले गुणों से दूर रखने में सक्षम होगा। और व्यक्ति सच्चाई को देख सकेगा कि यह बहुत स्पष्ट रूप से क्या है। भौतिक अस्तित्व क्या है और भौतिक अस्तित्व ने हमें कैसे छला है।
इसलिए, जब हम पवित्र नाम का जप कर रहे हैं, तो बहुत से लोग कहते हैं, ओह, मुझे जप में कोई रूचि नहीं मिल रही है, मुझे कोई आनंद नहीं लग रही है, ओह, मैं नहीं कर पा रहा हूँ, क्या मैं कृष्ण का रूप देख सकता हूँ? क्या मैं उनकी लीलाओं के विषय में चिंतन कर सकता हूँ? इस तरह पवित्र नाम जप के क्षेत्र में भी, जीव अपने मन से उत्पन्न होने वाले अधिक से अधिक मनगढ़ंत विचारों के साथ आते हैं। मुझे जप पसंद है, मुझे आज जप पसंद नहीं है, आज जप उबाऊ है, कल जप अच्छा था। तो सब कुछ सनकी दिमाग से उठता है, इसलिए, हमें पता होना चाहिए कि हम जप स्वयं प्रसन्नता अनुभव करने के लिए या कृष्ण की लीलाओं को देखने के लिए नहीं कर रहे हैं, हम वास्तव में स्वयं शुद्ध होने के लिए जप कर रहे हैं। शुद्ध हुए बिना, भुक्ति, मुक्ती, सिद्धि के रोग को दूर किए बिना कृष्ण को देखने का प्रश्न ही नहीं है तो कृष्ण की लीला में प्रवेश करने का सवाल ही कहां है?
इसलिए, इस भौतिक संसार में हमारी पतित स्थिति, प्रेत बाधित स्थिति को पहचानते हुए स्वयं को विनम्र अनुभव करना चाहिए, तीन गुणों से आच्छादित होने के कारण। और गुरु, श्रील प्रभुपाद, गुरु परम्परा वे एक चमकते हुए दीपक के समान हैं, ज्ञान का प्रकाश, पारलौकिक ज्ञान और वे सत्य को स्पष्टता के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि कोई उन के प्रति समर्पण करता है, तो इस स्थिति से बाहर आने की आशा है।
इसलिए, हमें पवित्र नाम का जप करना है, विशेष रूप से आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न करने के लिए, हमारे ह्रदय को शुद्ध करने के लिए, अपने मन को ऊंचा उठाने के लिए, इस भूत बाधित स्थिति को छोड़ने के लिए, और शांति से कृष्ण की सेवा में लगे रहने के लिए प्रसन्नता पूर्वक। और हमें इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। यदि हम ये काम कर सकते हैं, तो भगवान प्रसन्न होते हैं, आचार्य प्रसन्न होते हैं, बस। जो भी आना है, जो भी हम आशा कर रहे हैं वो अंततः अपने दम पर आ जाएगा, उसके लिए हमारी लालसा के बिना भी। इस तरह, पवित्र नाम का जप असीमित आनंद, और असीमित ज्ञान और असीमित सौभाग्य का भी द्वार खोलता है।
हरिनाम प्रभु की जय!
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हरे कृष्ण,
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