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जप प्रेरणा - विस्मृति और अनुचित परिचय का त्याग करना – Giving up Forgetfulness and Misidentification - २८ मार्च २०

विस्मृति और अनुचित परिचय का त्याग करना – Giving up Forgetfulness and Misidentification

जप प्रेरणा – २८ मार्च २० – श्रीमान राधेश्याम प्रभु द्वारा जप प्रवचन

हरे कृष्ण।


हम भगवान् की विस्मृति और भौतिक शरीर से अनुचित परिचय को कैसे त्याग सकते हैं?

उसके लिए व्यक्ति को भगवान् के अच्छे पुत्रों में गिना जाना होगा। आप गजेन्द्र की प्रार्थनाओं में पाते हैं कि यद्यपि वह भगवान् को भूल गया था, वह स्वयं को शरीर के साथ अनुचित रूप से परिचित कर रहा था और एक विशेष अवधि के लिए जंगल के राजा के रूप में हाथियों के समुदाय में आनंद ले रहा था, और उसे एक दर्दनाक स्थिति में डाल दिया गया था मगरमच्छ द्वारा पकड़े जाने पर। वह अपनी चेतना में आया और तब अपने अतीत के आध्यात्मिक जीवन अभ्यास  के कारण, तुरंत उसे याद आया और उसकी प्रार्थना हमें इस बात का अनुमान देती है कि कैसे एक व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान के पास जाना चाहिए। उसका तर्क बहुत, बहुत शक्तिशाली है। वह कहता है, जहाँ भी आप बच्चों को पाते हैं तो  बच्चों के लिए माता-पिता होते ही हैं, कोई भी बच्चा हवा से पैदा नहीं होता है। इसी तरह, हम सभी चेतन जीव सचेत जीवात्माएं हैं। निश्चित रूप से, हमारे एक पिता होने चाहिए जिसके बिना हम पैदा नहीं हुए होंगे। इसके अतिरिक्त, वे कहते हैं, मेरी आँखें हावी मानसिकता की रजोगुण और तमोगुण की धूल से ढंकीं हुई हैं, भोगी मानसिकता, नियंत्रक भाव। जिसके कारण मेरे पिता, सर्वोच्च पिता, भगवान मेरी आँखों से दिखाई नहीं देते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह मौजूद नहीं है। मैं देख पाऊंगा कि यह धूल कब साफ होगी लेकिन अभी के लिए, ये जगत जो सूर्य, और चंद्रमा और असंख्य ग्रहों के साथ मेरी आंखों के सामने उपस्थित है, और इन ग्रहों के भीतर जीवित रहने के लिए सभी अवयवों के साथ, ये सब स्वयं भगवान् के साक्षी हैं। क्योंकि स्वयं भगवान विश्वं बन गए हैं, वे विश्वं श्रृष्टि कर्ता हैं और वे स्वयं विश्वं भी हैं और इस संसार के सभी अवयव भी हैं। इसलिए मैं उन्हें नमन करता हूं, वो कहता है।

इसलिए, गजेंद्र स्पष्ट रूप से ये देखने में सक्षम है कि सभी और सब कुछ भगवान् से आया है। हर कोई और सब कुछ भगवान् से जुड़ा है। सभी, और सब कुछ भगवान् में आश्रित हैं और सब कुछ भगवान् पर निर्भर है। और इस जगत में रहने वाले सभी जीव विभिन्न रूपों में भगवान् से प्राप्त पोषण के बिना जीवित नहीं रह सकते।

तो यह सर्वोच्च समझने का प्रारंभिक चरण है, भले ही वह कभी भी भगवान् के नाम को नहीं जानता था। वह भगवान् का नाम भूल गया था। वह जानता था कि एक सर्वोच्च शाश्वत है, जो हम सभी की तरह असंख्य अनंत काल से संभाले हुए है। इसलिए, व्यक्ति को भगवान के अच्छे पुत्रों में गिने जाने की इच्छा होनी चाहिए, जो विस्मृति की व्याधि से मुक्त होने के लिए उत्सुक है, जो सर्वोच्च के समक्ष समर्पण की प्रक्रिया के द्वारा शरीर के साथ अनुचित परिचय से मुक्त होने के लिए उत्सुक हैं, क्योंकि वो इस मनोदशा में आत्मसमर्पण कर रहा है, भगवान् बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि उसने विशेष रूप से भगवान् का नाम नहीं लिया, फिर भी भगवान गजेंद्र के सामने दयापूर्वक प्रकट हुए। और फिर जैसे ही उसने भगवान को आकाश में गरुड़ की पीठ पर बैठे देखा, उनके चार हाथों में शक, चक्र, गदा, पद्म के साथ मुकुट और कुंडल और सब कुछ था। तुरंत याद आया क्योंकि उन्होंने पहले से ही पिछले जीवन में भक्ति की थी।

नारायण अखिल गुरु भगवन नमस्ते, हे भगवान, परम व्यक्तित्व, ओह नारायण, पूरे ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु, मैं आपको नमन करता हूं। तो इस तरह से फिर से उसने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे मुक्त कर दिया गया और स्वरुप्य सिद्धि में उसकी शास्वत स्थिति में पुनःस्थापित कर दिया गया।

इसलिए हर दिन पवित्र नाम का जप वास्तव में हमें स्मरण दिलाना चाहिए कि मैं भगवान का एक अंश हूं, मैं भगवान् से जुड़ा हुआ हूं, मैं भगवान् पर निर्भर हूं, मैं भगवान के चरण कमलों में आश्रित हूं, और मेरे पास मुझ पर उसकी दृष्टी और मेरे लिए उनके पोषण के अतिरिक्त मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इसलिए, यदि कोई भी इस विषय में गंभीरता से विचार करता है, तो यह बहुत स्वाभाविक है, इस तरह की सोच का एक प्राकृतिक उपोत्पाद, जिसे मुझे उसका नाम पुकारना है और मुझे उनकी सेवा करनी है। मुझे उन्हें प्रसन्न करना है। मुझे उन्हें संतुष्ट करना होगा। और यह पूर्णतः पवित्र नाम के जप द्वारा किया जाता है।

हरिनाम प्रभु की जय!

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हरे कृष्ण,

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