जप प्रेरणा – शुद्ध पवित्र नाम, भौतिक जिव्हा का उत्पाद नहीं अपितु एक दिव्य उपहार है - भाग ३ - ११ फरवरी २०
जप प्रेरणा – ११ फरवरी २० - परम पूज्य शचीनन्दन स्वामी महाराज की पुस्तक नाम रहस्य से अंश।
शुद्ध पवित्र नाम, भौतिक जिव्हा का उत्पाद नहीं अपितु एक दिव्य उपहार है (शेष भाग)
जब हम जप करते हैं, तो हम यज्ञ करते हैं, नाम यज्ञ। हमारे यज्ञ की परिणति के रूप में हम आशा करते हैं, कि कृष्ण प्रकट होंगे। अग्नि यज्ञ में मनुष्य द्वारा किए गए प्रबंधों के समान हमें पवित्र नाम का जप करने के लिए अपनी मानवीय शक्ति में निहित सब कुछ करना होगा। लेकिन अंत में, हमें कृष्ण की दिव्य उपस्थिति के लिए विनम्रतापूर्वक याचना करनी होगी। वास्तव में, यह पवित्र नाम के लिए विनम्रतापूर्वक याचना करने की भावना ही है जो भगवान् के ह्रदय के शांत कुंड में दया की लहरें बनाती है और उन्हें हमारी दिशा में बहने देती है। तभी हमारे लिए पवित्र नाम का सही जप करना संभव होगा। यह हमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोक पर लाता हैअतः श्री कृष्ण नामादी ना भवेत ग्राह्यं इंद्रिये
सेवन मुखेही जीह्वादौ स्वयं एव स्पुरत्या अदा (चै.चरि. मध्य १७.१३६)
इसलिए भौतिक इंद्रियां कृष्ण के पवित्र नाम, रूप, गुणों और लीलाओं की सराहना नहीं कर सकती हैं। जब एक बद्ध आत्मा कृष्ण चेतना के लिए जागृत होती है और भगवान के पवित्र नाम का जप और भगवान के भोजन के अवशेषों के आस्वादन के लिए अपनी जिव्हा का उपयोग करके सेवा करती है, तो जिव्हा शुद्ध हो जाती है, और धीरे-धीरे यह समझ में आता है कि कृष्ण वास्तव में कौन है। दूसरे शब्दों में, भगवान अपने भक्तों की इंद्रियों और मन में अपनी ही शक्ति के द्वारा प्रकट होते हैं जब वे भक्त के सेवा भाव से प्रसन्न होते हैं।
यह बात और भी स्पष्ट करने में सहायक हो सकती है। सेवा देने के भाव में जप करें, सेवा लेने के भाव में नहीं। भगवान् को आनंद देने के भाव में जप करें, स्वयं आनंदित होने के भाव में नहीं। कृष्ण रसराज, भोग के राजा हैं, आप नहीं।
सेवा भाव एकमात्र ऐसा भाव है जिसमें हम वास्तविक रूप से भगवान से संपर्क कर सकते हैं। हम उनसे ऐसे संपर्क नहीं कर सकते जैसे कि हम स्वामी हैं।
नाम भजन के महान आचार्य हमें स्मरण दिलाते हैं कि श्रवण(श्रवण) से शुरू होने वाली और आत्म निवेदनम(पूर्ण आत्म समर्पण) के साथ समाप्त होने वाली भक्ति के सभी नौ अंग जप की प्रथा में उपस्थित हैं। व्यक्तिगत मार्गदर्शन के साथ जप करते समय उनका अभ्यास करना संभव है।
हरिनाम प्रभु की जय!!!
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हरे कृष्ण,
उपरोक्त परम पूज्य सचिनंदन स्वामी महाराज की पुस्तक नाम रहस्य के अंश का हिंदी में अनुवाद है। इस पुस्तक के विषय में और अधिक जानकारी के लिए कृपया ये लिंक पर जाइये
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